प्रेम प्रसंग

कुछ अल्फ़ाज़ साथ नही देते,
कुछ ज़बान दगा दे जाती है,
मैं आज तक समझ नही पाया,
यह दिल की बात कैसे बताई जाती है||

यूँ तो रोज़ मेरी उंगलियाँ
WhatsApp के keypad पे किटिर पीटिर करती हैं |
पर प्रसंग जब प्रेम का हो,
तो न जाने इन्हे कौन सी ज़ंग लग जाती है

आख़िर क्यूँ मुझे इन शब्दों को
तोड़ मरोड़ कर पेश करना पड़ता है ?
क्यों यह सहज सी बात
तुम्हारे माथे पर चिंता की लकीरें छोड़ जाती हैं ?

मैं आज तक समझ नही पाया
यह दिल की बात कैसे बताई जाती है ||

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